ज़रा सोचिए. दो मुल्कों के बीच जंग छिड़ी है. दोनों मुल्क के सिपाही आर-पार की लड़ाई लड़ रहे हैं. तभी एक मुल्क की सेना कम पड़ जाती है. जंग अब नाजुक हालात में है. सेना की पूरी तादाद हो, तो वो देश जंग जीत सकता है. भले ही उसके देश में लड़ने के लिए और सिपाही ना हों. बस पैसे होने चाहिए, क्योंकि उन्हीं पैसों से वो किसी और देश से किराए पर आर्मी को बुलवा सकता है. जी हां, आपको शायद यकीन ना हो. मगर ये सच है कि एक बहुत बड़ा देश बाकायदा दुनिया के कई देशों को जंग लड़ने के लिए किराए पर अपनी सेना देता है.
सीरिया में आईएसआईएस आतंकियों को खदेड़ने के लिए चलाया गया ये ऑपरेशन हकीकत है. इस ऑपरेशन की ये तस्वीरें सच्ची हैं. वे बगदादी के आतंकी हैं या नहीं. मगर क्या सच में ये सीरियाई सेना के सैनिक हैं? जी, इस क्वेशचन मार्क यानी प्रश्न वाचक चिन्ह को बहुत संजीदगी से लीजिए. क्योंकि इसी में उस छलावे की सारी कहानी छुपी हुई है, जो रुस दुनिया से कर रहा है.
इन्होंने यूक्रेन में कोहराम मचाया. इन्होंने सीरिया में आतंकियों का मार भगाया. ये सैनिक नहीं छलावा हैं. ये किराए के सैनिक हैं. बस, इनकी इतनी ही पहचान हैं. ये कहीं भी. कभी भी. किसी के लिए भी. लड़ते हैं. बदले में इन्हें पैसे मिलते हैं और आदेश ये सिर्फ हेडक्वॉटर का सुनते हैं. कौन हैं ये.
यूक्रेन की जंग में ये विद्रोहियों के साथ लड़े. सीरिया में इन्होंने सेना का साथ दिया. अब ये सूडान और मध्य अफ़्रीकी देशों में लड़ रहे हैं. और जल्द ही ये लीबिया का रुख़ करेंगे. पीएमसी वैग्नर के सैनिक हैं. यानी प्राइवेट मिलिट्री कॉन्ट्रैक्टर. रुस की एक निजी सैन्य कंपनी है, जो किराए के सैनिक तैयार करती है. और अपने क्लाइंट यानी ग्राहकों के लिए जंग लड़ती है.
अब तक ये रशियन आर्मी, नोवोरोसिया की आर्मी, सीरियन आर्म्ड फोर्स और ईरानी आर्म्ड फोर्स के लिए जंग का कॉन्ट्रैक्ट लेकर वहां अपने सैनिकों को भेज कर कोहराम मचा चुकी है. जिन दुश्मनों पर इन्होंने पैसों के बदले कहर बरसाया उनमें इस्लामिक स्टेट, अल-नुसरा फ्रंट, फ्री सीरियन आर्मी और यूक्रेन की आर्मी शामिल है.
साल 2011 से लेकर 2014 तक आईएसआईएस ने सीरिया के ज़्यादातर हिस्से को अपने कब्ज़े में ले लिया था. ऐसा लगा कि जैसे दमिश्क भी अब बस राष्ट्रपति बशर अल असद के हाथों से निकलने वाला है. और उनका तख्ता पलट तय है. मगर सूत्रों के मुताबिक इसी दौरान हुई एक खुफिया डील. ये डील थी किराए के इन सैनिकों की. डील के मुताबिक पीएमसी वैग्नर अपने सैनिकों को सीरिया के रण में भेजेगा जो सीरियाई मिलिट्री के साथ मिलकर आतंकियों को खदेड़ेंगे. हां, बदले में वैग्नर कंपनी को अच्छी खासी रकम दी गई.
मगर यकीन मानिए साल 2014 में जैसे ही वैग्नर के सैनिकों ने सीरिया की धरती पर कदम रखा. बगदादी के लड़ाकों की जैसे शामत ही आ गई. साल भर के अंदर किराए के इन सैनिकों ने सीरिया की ज़मीन को इन आतंकियों की लाशों से पाट दिया. आलम ये हुआ कि चंद जगहों को छोड़कर पूरे सीरिया से बगदादी के आतंकियों के पांव उखड़ गए. और बाकी का काम सीरियन आर्मी ने पूरा किया. हालांकि ये खबर तो नहीं मिली कि वैग्नर ने अपने कितने सैनिकों को सीरिया के फ्रंट पर भेजा था. मगर इतना ज़रूर पता चला कि हज़ारों सैनिकों को मारने वाले उसके सैनिकों में 18 मौत की मौत भी हुई.
सीरिया में जंग करने वाले वैग्नर सैनिक का कहना है कि हमारी टुकड़ी पलमायरा की जंग में शामिल हुई. पहले हमारी टीम ने युद्धक्षेत्र का मुआयना किया और फिर पूरी प्लानिंग के साथ हम मैदान में उतरे. हमने हज़ारों आतंकियों को मारा. मगर हमारे 18 सैनिक भी मारे गए. एक साल में हमने वहां की स्थिति पर काबू पा लिया और सीरियन आर्मी के लिए रास्ता तैयार कर दिया.
दूसरे देशों के उलट रूस में ऐसी प्राइवेट सैन्य कंपनियां लीगल हैं. ऐसा करने के पीछे रूस का मक़सद युद्ध होने पर किसी भी आपात स्थिति से निपटना है. मगर आधिकारिक तौर पर रूसी अधिकारी वैग्नर या ऐसी किसी दूसरी कंपनी के अस्तित्व की बात ही नहीं मानते हैं. लिहाज़ा ये बात मानना तो दूर की बात है कि उसके किराए के सैनिकों ने दूसरे देशों में जंग का ठेका लिया.
रक्षा विशेषज्ञ पॉवेल फेल्गनहॉर के मुताबिक ज़ाहिर तौर पर वैग्नर का अस्तित्व है. और उसके तथाकथित स्वयंसेवक उन तमाम युद्धक्षेत्रों में नज़र आते रहे हैं. जहां रूसी सरकार उन्हें भेजना चाहती है. डॉनबास और सीरिया इसके उदाहरण हैं. मगर इन्हें लीगलाइज़्ड नहीं किया गया है.
रुसी सरकार भले ऐसी किसी प्राइवेट सेना से इनकार करे. मगर अब एक एजेंसी के खुलासे के बाद दुनिया को पता चल चुका है कि युद्ध की तैयारी के लिए रूस ने अपने मुल्क में ऐसी कई प्राइवेट आर्मी बना रखी हैं. साथ ही वो इन प्राइवेट सेनाओं को उन जगहों पर भी इस्तेमाल करती है. जहां अंतर्राष्ट्रीय दबाव की वजह से सीधे तौर पर वो अपनी सेनाएं नहीं भेज सकती.
Friday, December 7, 2018
Tuesday, December 4, 2018
मोदी ने कहा- बंटवारे के वक्त कांग्रेस की गलतियों से करतारपुर पाकिस्तान में चला गया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को यहां एक चुनावी सभा में भारत-पाकिस्तान बंटवारे के वक्त की कांग्रेस की गलतियों को गिनाया। उन्होंने कहा कि इन्हीं गलतियों में से एक करतारपुर है। गुरुनानक देव की भूमि बंटवारे में पाकिस्तान में चली गई, क्योंकि कांग्रेस ने इस पर ध्यान नहीं दिया।
मोदी ने कहा कि विभाजन के वक्त अगर कांग्रेस नेताओं में इस बात की थोड़ी भी समझदारी, संवेदशीलता और गंभीरता होती तो तीन किलोमीटर की दूरी पर हमारा करतारपुर हमसे अलग नहीं होता। सत्ता के मोह में कांग्रेस पार्टी ने इतनी गलतियां की हैं जिनको आज पूरे देश को भुगतना पड़ रहा है। मोदी सरकार ने हाल ही में कैबिनेट बैठक में करतारपुर कॉरिडोर बनाने को मंजूरी दी। इसका निर्माण गुरदासपुर के डेरा बाबा नानक से पाकिस्तान से सटी अंतरराष्ट्रीय सीमा तक किया जाएगा। उधर, पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा तक इस कॉरिडोर का निर्माण करेगा।
मोदी ने करतारपुर का जिक्र क्यों किया?
प्रधानमंत्री मोदी ने इस सभा से श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिले की 11 सीटों को कवर किया। ये क्षेत्र पंजाब बॉर्डर से जुड़ा है। यहां सिख समुदाय का अच्छा प्रभाव है।
मोदी ने कहा- 1947 में कांग्रेस को क्यों याद नहीं आया करतारपुर
"1947 में जब भारत का विभाजन हुआ तो राजगद्दी में बैठने की इतनी जल्दबाजी थी कि मुसलमानों को इस्लाम के नाम पर अलग देश चाहिए था। उनका एजेंडा साफ था। उस समय के नीति निर्धारकों से गलतियां हुईं। उसी का नतीजा है कि गुरुनानक देव की कर्मभूमि करतारपुर साहब पाकिस्तान में चला गया।"
"आज अगर करतारपुर कॉरिडोर बन रहा है तो इसका क्रेडिट मोदी को नहीं बल्कि देश की जनता के वोट को जाता है।"
"70 साल तक कांग्रेस सत्ता में रही। लड़ाइयां भी लड़ीं। लाहौर में झंडा फहराने की बात हुई। नानक के चरणों में माथा टेकने का प्रबंध नहीं हुआ। 365 दिन जब कारिडोर बन जाएगा तो कोई भी हिंदुस्तानी आराम से करतारपुर चला जाएगा। माथा टेक कर चला आएगा। यह पूछना चाहिए कि आपको 1947 में करतारपुर हिंदुस्तान में होना चाहिए यह आपको याद क्यों नहीं आया। वह जो भी करके गए मेरे नसीब में ही आया है। इसका क्रेडिट किसको है?"
नामदार कहेगा हरी मिर्च की नहीं, लाल मिर्च की खेती करिए
"नामदार झूठ बोलकर किसानों का अपमान करते हैं। इसमें वे माहिर हैं। इस नामदार से कोई कह दे कि हरी मिर्च के किसान को कम पैसा मिलता है और लाल मिर्च के किसान को ज्यादा। तो वे भाषण देंगे कि किसानों को हरी की नहीं लाल मिर्च की खेती करनी चाहिए।"
"पांच साल पहले अखबार में हेडलाइन होती थी- आज कोयले में इतना घोटाला हुआ, 2जी का घोटाला हुआ, पनडुब्बी में घोटाला हुआ, इसने चोरी की, उसने लूट लिया। ऐसी ही खबरें आती थीं। आज सरकार बने चार साल से ज्यादा हो गए हैं। अब ऐसी खबरें
नहीं आतींं, देश के पैसों की लूट बंद हो गई।"
मोदी ने कहा- कांग्रेस ने फतवा जारी किया, मैं भारत माता की जय नहीं बोलूं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीकर की सभा में कहा कि इंदिरा इज इंडिया से लेकर भारत मां की जय के बजाय सोनिया गांधी की जय बोलना नामदार का चरित्र है, हम तो जिएंगे भी भारत मां के लिए और मरेंगे तो भी भारत के लिए। कांग्रेस ने फतवा जारी किया है कि मुझे रैलियों में भारत भाता की जय नहीं बोलना चाहिए। वे कैसे इससे मना कर सकते हैं? उन्हें ऐसा बोलने में शर्म आना चाहिए। यह दिखाता है कि वे भारत माता का सम्मान नहीं करते।
मोदी ने कहा कि विभाजन के वक्त अगर कांग्रेस नेताओं में इस बात की थोड़ी भी समझदारी, संवेदशीलता और गंभीरता होती तो तीन किलोमीटर की दूरी पर हमारा करतारपुर हमसे अलग नहीं होता। सत्ता के मोह में कांग्रेस पार्टी ने इतनी गलतियां की हैं जिनको आज पूरे देश को भुगतना पड़ रहा है। मोदी सरकार ने हाल ही में कैबिनेट बैठक में करतारपुर कॉरिडोर बनाने को मंजूरी दी। इसका निर्माण गुरदासपुर के डेरा बाबा नानक से पाकिस्तान से सटी अंतरराष्ट्रीय सीमा तक किया जाएगा। उधर, पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा तक इस कॉरिडोर का निर्माण करेगा।
मोदी ने करतारपुर का जिक्र क्यों किया?
प्रधानमंत्री मोदी ने इस सभा से श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिले की 11 सीटों को कवर किया। ये क्षेत्र पंजाब बॉर्डर से जुड़ा है। यहां सिख समुदाय का अच्छा प्रभाव है।
मोदी ने कहा- 1947 में कांग्रेस को क्यों याद नहीं आया करतारपुर
"1947 में जब भारत का विभाजन हुआ तो राजगद्दी में बैठने की इतनी जल्दबाजी थी कि मुसलमानों को इस्लाम के नाम पर अलग देश चाहिए था। उनका एजेंडा साफ था। उस समय के नीति निर्धारकों से गलतियां हुईं। उसी का नतीजा है कि गुरुनानक देव की कर्मभूमि करतारपुर साहब पाकिस्तान में चला गया।"
"आज अगर करतारपुर कॉरिडोर बन रहा है तो इसका क्रेडिट मोदी को नहीं बल्कि देश की जनता के वोट को जाता है।"
"70 साल तक कांग्रेस सत्ता में रही। लड़ाइयां भी लड़ीं। लाहौर में झंडा फहराने की बात हुई। नानक के चरणों में माथा टेकने का प्रबंध नहीं हुआ। 365 दिन जब कारिडोर बन जाएगा तो कोई भी हिंदुस्तानी आराम से करतारपुर चला जाएगा। माथा टेक कर चला आएगा। यह पूछना चाहिए कि आपको 1947 में करतारपुर हिंदुस्तान में होना चाहिए यह आपको याद क्यों नहीं आया। वह जो भी करके गए मेरे नसीब में ही आया है। इसका क्रेडिट किसको है?"
नामदार कहेगा हरी मिर्च की नहीं, लाल मिर्च की खेती करिए
"नामदार झूठ बोलकर किसानों का अपमान करते हैं। इसमें वे माहिर हैं। इस नामदार से कोई कह दे कि हरी मिर्च के किसान को कम पैसा मिलता है और लाल मिर्च के किसान को ज्यादा। तो वे भाषण देंगे कि किसानों को हरी की नहीं लाल मिर्च की खेती करनी चाहिए।"
"पांच साल पहले अखबार में हेडलाइन होती थी- आज कोयले में इतना घोटाला हुआ, 2जी का घोटाला हुआ, पनडुब्बी में घोटाला हुआ, इसने चोरी की, उसने लूट लिया। ऐसी ही खबरें आती थीं। आज सरकार बने चार साल से ज्यादा हो गए हैं। अब ऐसी खबरें
नहीं आतींं, देश के पैसों की लूट बंद हो गई।"
मोदी ने कहा- कांग्रेस ने फतवा जारी किया, मैं भारत माता की जय नहीं बोलूं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीकर की सभा में कहा कि इंदिरा इज इंडिया से लेकर भारत मां की जय के बजाय सोनिया गांधी की जय बोलना नामदार का चरित्र है, हम तो जिएंगे भी भारत मां के लिए और मरेंगे तो भी भारत के लिए। कांग्रेस ने फतवा जारी किया है कि मुझे रैलियों में भारत भाता की जय नहीं बोलना चाहिए। वे कैसे इससे मना कर सकते हैं? उन्हें ऐसा बोलने में शर्म आना चाहिए। यह दिखाता है कि वे भारत माता का सम्मान नहीं करते।
Thursday, November 15, 2018
साथ बने थे तीन राज्य, झारखंड से आगे निकले छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड
वर्ष 2000 में झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ का गठन एक साथ हुआ था। आज तीनों ही छोटे राज्य अपने पैरेंट स्टेट के मुकाबले तो तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, परंतु इन तीनों छोटे राज्यों का आपस में तुलनात्मक अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि सामाजिक-आर्थिक विकास के पैमानों में झारखंड की तरक्की बाकी दोनों राज्यों के मुकाबले काफी धीमी है।
उद्योगों को आकर्षित करने के मामले में छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड दोनों ने ही झारखंड से बेहतर प्रदर्शन किया है, हालांकि मध्यम और लघु उद्योगों में झारखंड बेहतर काम कर रहा है। यही नहीं, आम आदमी से जुड़ी बिजली-पेयजल और सड़क जैसी चीजों में भी दोनों राज्यों का प्रदर्शन झारखंड से अच्छा है।
तीनों राज्यों में छत्तीसगढ़ का प्रदर्शन बेहतर है। इसका बड़ा कारण यहां राजनीतिक स्थिरता को माना जा सकता है। इसका फायदा सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार के रूप में वहां स्पष्ट नजर आता है। नीति और इसके क्रियान्वयन की स्पष्टता के कारण आज गरीबों तक राशन पहुंचाने के मामले में छत्तीसगढ़ पूरे देश के लिए मिसाल बन गया है। हालांकि, राजनीतिक स्थिरता के बावजूद छत्तीसगढ़ अपराधों पर लगाम कसने में नाकाम रहा है।
ओवरऑल उद्योगों की संख्या में बढ़ोतरी के मामले में बाकी दोनों राज्यों का प्रदर्शन झारखंड से बेहतर है। उद्योगों के बढ़ने की गति सबसे तेज उत्तराखंड में है। वहीं उद्योगों को मिलने वाले कर्ज में सबसे तेज बढ़ोतरी छत्तीसगढ़ की है। मध्यम व लघु उद्योगों के मामले में झारखंड का प्रदर्शन बाकी दोनों राज्यों से बेहतर है। उत्तराखंड में इन उद्योगों में निवेश की मात्रा ज्यादा है, मगर ये वहां की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण है।
ग्रामीण घरों में शौचालयों की उपलब्धता में झारखंड में अभी करीब 55% ही लक्ष्य हासिल किया जा सका है। स्कूलों व आंगनबाड़ियों में शौचालय निर्माण में भी छत्तीसगढ़ बेहतर है। जबकि झारखंड का प्रदर्शन उत्तराखंड से बेहतर रहा है, मगर आंगनबाड़ियों में शौचालय निर्माण के मामले में हम राष्ट्रीय औसत से भी पीछे हैं।
झारखंड ने सड़कों का नेटवर्क सबसे तेजी से बढ़ाया है। हालांकि इसके बावजूद वाहनों के रजिस्ट्रेशन में छत्तीसगढ़ दोगुने से ज्यादा आगे है। वहीं वाहनों की वृद्धि की दर में उत्तराखंड भी झारखंड से आगे है। इससे ये पता चलता है कि राज्य में सड़कों का नेटवर्क बढ़ने के बावजूद गुणवत्ता खराब है।
लिंगानुपात बाकी दोनों राज्यों में झारखंड से बेहतर है, मगर इसमें सुधार की दर के मामले में झारखंड आगे है। शिशु मृत्युदर कम करने के मामले में झारखंड सबसे आगे है, जबकि टीकाकरण के मामले में छत्तीसगढ़ का प्रदर्शन ही हमसे बेहतर है। उत्तराखंड में न सिर्फ सुधार की गति धीमी है, बल्कि बच्चों का टीकाकरण वहां घट गया है।
ग्रामीण विद्युतीकरण में तो बाकी दोनों राज्य झारखंड से आगे हैं, मगर सुधार की दर सबसे तेज झारखंड में ही है। हालांकि घरों तक बिजली पहुंचाने और बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करने में झारखंड बाकी दोनों राज्यों से काफी पीछे है। यहां बिजली उत्पादन की वृद्धि दर बाकी दोनों राज्यों से बहुत कम है। इस मामले में सबसे अच्छा प्रदर्शन छत्तीसगढ़ का है।
उद्योगों को आकर्षित करने के मामले में छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड दोनों ने ही झारखंड से बेहतर प्रदर्शन किया है, हालांकि मध्यम और लघु उद्योगों में झारखंड बेहतर काम कर रहा है। यही नहीं, आम आदमी से जुड़ी बिजली-पेयजल और सड़क जैसी चीजों में भी दोनों राज्यों का प्रदर्शन झारखंड से अच्छा है।
तीनों राज्यों में छत्तीसगढ़ का प्रदर्शन बेहतर है। इसका बड़ा कारण यहां राजनीतिक स्थिरता को माना जा सकता है। इसका फायदा सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार के रूप में वहां स्पष्ट नजर आता है। नीति और इसके क्रियान्वयन की स्पष्टता के कारण आज गरीबों तक राशन पहुंचाने के मामले में छत्तीसगढ़ पूरे देश के लिए मिसाल बन गया है। हालांकि, राजनीतिक स्थिरता के बावजूद छत्तीसगढ़ अपराधों पर लगाम कसने में नाकाम रहा है।
ओवरऑल उद्योगों की संख्या में बढ़ोतरी के मामले में बाकी दोनों राज्यों का प्रदर्शन झारखंड से बेहतर है। उद्योगों के बढ़ने की गति सबसे तेज उत्तराखंड में है। वहीं उद्योगों को मिलने वाले कर्ज में सबसे तेज बढ़ोतरी छत्तीसगढ़ की है। मध्यम व लघु उद्योगों के मामले में झारखंड का प्रदर्शन बाकी दोनों राज्यों से बेहतर है। उत्तराखंड में इन उद्योगों में निवेश की मात्रा ज्यादा है, मगर ये वहां की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण है।
ग्रामीण घरों में शौचालयों की उपलब्धता में झारखंड में अभी करीब 55% ही लक्ष्य हासिल किया जा सका है। स्कूलों व आंगनबाड़ियों में शौचालय निर्माण में भी छत्तीसगढ़ बेहतर है। जबकि झारखंड का प्रदर्शन उत्तराखंड से बेहतर रहा है, मगर आंगनबाड़ियों में शौचालय निर्माण के मामले में हम राष्ट्रीय औसत से भी पीछे हैं।
झारखंड ने सड़कों का नेटवर्क सबसे तेजी से बढ़ाया है। हालांकि इसके बावजूद वाहनों के रजिस्ट्रेशन में छत्तीसगढ़ दोगुने से ज्यादा आगे है। वहीं वाहनों की वृद्धि की दर में उत्तराखंड भी झारखंड से आगे है। इससे ये पता चलता है कि राज्य में सड़कों का नेटवर्क बढ़ने के बावजूद गुणवत्ता खराब है।
लिंगानुपात बाकी दोनों राज्यों में झारखंड से बेहतर है, मगर इसमें सुधार की दर के मामले में झारखंड आगे है। शिशु मृत्युदर कम करने के मामले में झारखंड सबसे आगे है, जबकि टीकाकरण के मामले में छत्तीसगढ़ का प्रदर्शन ही हमसे बेहतर है। उत्तराखंड में न सिर्फ सुधार की गति धीमी है, बल्कि बच्चों का टीकाकरण वहां घट गया है।
ग्रामीण विद्युतीकरण में तो बाकी दोनों राज्य झारखंड से आगे हैं, मगर सुधार की दर सबसे तेज झारखंड में ही है। हालांकि घरों तक बिजली पहुंचाने और बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करने में झारखंड बाकी दोनों राज्यों से काफी पीछे है। यहां बिजली उत्पादन की वृद्धि दर बाकी दोनों राज्यों से बहुत कम है। इस मामले में सबसे अच्छा प्रदर्शन छत्तीसगढ़ का है।
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